गगनानी गंगोत्री मार्ग का प्रमुख पड़ाव है। उत्तरकाशी से 46 किलोमीटर की दूरी स्थित यह गांव प्राकृतिक सुंदरता से संपन्न है। इसके यह चारों ओर फैली शांति ध्यान और साधना के लिए इसे उपयुक्त स्थान बनाती है।
यात्री कुछ देर यहाँ रुक कर यहाँ स्थित गर्म पानी के झरने में स्नान का आनंद भी लेते हैं। भटवारी और गंगनानी के बीच से एक मार्ग बरसु गांव की ओर जातों है। जहा से दयारा बुग्वाल की चढ़ाई शुरू होती है अगर आप उत्तरकाशी और गंगोत्री की यात्रा पर हैं और आपके पास अतिरिक्त समय है तो दयारा भी जा सकते हैं। वैसे दयारा के लिए आपके पास टैंट आदि का बंदोबस्त होना चाहिए।
यहाँ से आगे बढ़ने पर अगला खूबसूरत पड़ाव हैं हर्सिल। उत्तरकाशी से गंगनानी तक गंगा एक तंग घाटी में बहती है, लेकिन हर्सिल एक चौड़ी घाटी है।
हर्सिल हिमालय की सुन्दरतम घाटियों में से एक है। जब सर्दियों में बर्फ पड़ जाती है तो इसका सौंदर्य देखते ही बनता है। बहुत से ट्रैकर हर्सिल को ही अपना ठिकाना बनाते हैं।
माँ गंगा का मायका भी हरसिल के मुखबा गांव में ही है, जिसे मुखीमठ के नाम से जाना जाता हैं। शीतकाल मे माँ गंगा की पूजा यहीं होती है। हर्सिल में भोटिया जनजाती की लोगों की बहुलता है। 'राम तेरी गंगा मैली' फिल्म की शूटिंग भी यहीं हुई थी।
| पहाड़ी विल्सन की कहानी |
पहाड़ी विल्सन की कहानी: The English Raja of Harsil
हर्सिल के बारे में एक कहानी और प्रसिद्ध है। कहा जाता है की यहाँ एक ब्रिटिश अफसर विल्सन रहते थे। इनका पूरा नाम था फ्रेडरिक ई विल्सन जो बहुत साहसी थे।
उन्होंने वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सेना की नौकरी छोड़ दी और टिहरी के राजा के पास शरण ली किन्तु राजा अंग्रेजों के प्रति बफादार थे। इसलिए उन्होंने शरण देने से इंकार कर दिया।
विल्सन उत्तरकाशी के हर्सिल चले गए जहाँ उन्होंने गुलाबी नाम की एक 'पहाड़ी लड़की से शादी की। रोजगार के लिए विल्सन ने लंदन स्थित एक कंपनी के साथ एक अनुबंध किया और जानवरों की खाल, फर और कस्तूरी आदि का व्यापर करने लगे। उस समय ब्रिटिश सरकार भारत में रेलवे लाइनों का निर्माण करवा रही थी जिसके जिसके उन्हें अच्छी गुणवत्ता वाली लकड़ियों की आवश्यकता थी। विल्सन ने इस अवसर का इस्तेमाल किया और देवदार के पेड़ काट - काट कर बेचने लगे। इस व्यापार के कारण उनकी हैसियत एक राजा जैसी हो गई। हर्सिल में ही उनके द्वारा बनवाई गई विशाल हवेली आज भी है।
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