11 वें ज्योतिर्लिंग को प्रलय से बचने वाला चमत्कारी पत्थर - दिव्य शिला

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दिव्य शिला - 11 वें ज्योतिर्लिंग भगवान केदारनाथ धाम

11 ज्योतिर्लिंग को प्रलय से बचने वाला चमत्कारी पत्थर - दिव्य शिला
 

केदारनाथ धाम को विनाशकारी सैलाब से बचने वाला जिसे शिव भक्तो ने नाम दिया दिव्य शिला 

पहला पत्थर, आदमी की उदरपूर्ति में उठा, दूसरा आदमी द्वारा आदमी के लिए उठा, तीसरे पत्थर ने उठने से इंकार कर दिया, और आदमी ने उसे देवता बना दिया। 11 वें ज्योतिर्लिंग भगवान. केदार के मंदिर को महाविनाश मैं बचाने वाली चट्टान ही यह तीसरा पत्थर है, जिसे आस्था ने दिव्य शिला नाम दिया। आज हर यात्री ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के बाद इस शिला के आगे शीश नवाना नहीं भूल रहा, बल्कि इस चट्टान ने तो भगवान भोलेनाथ के प्रति उसकी श्रद्धा और बढ़ा दी है। 

11 ज्योतिर्लिंग को प्रलय से बचने वाली भीम शिला


कुछ भक्त इस शिला को भीम शिला भी कहते है क्योकि यह शिला अपनी जगह ज़रा सी भी नहीं नहीं हिल रही थी। (
11 ज्योतिर्लिंग को प्रलय से बचने वाली भीम शिला )

विनाशकारी सैलाब ने पूरे केदारनाथ को बर्बाद कर दिया था। मजबूत से मजबूत इमारतों को तिनके की भांति उड़ा ले गया वह सैलाब और चंद मिनटों में केदारनाथ का नामोनिशान मिट गया। बावजूद इसके 'तबाही के बीच भी केदारनाथ का मंदिर चट्टान की तरह खड़ा रहा और इसकी वजह बनी वह विशालकाय चट्टान, जिसे यात्री ज्योतिलिंग के ही प्रतीक रूप में पूज रहे हैं। इस चट्टान के आगे एक ऐसी प्रलयकारी धारा हार गई, जिस पर तबाही ही तबाही लिखी हुई थी। चट्टान मंदिर के ठीक पीछे लगभग 30 फीट की दूरी पर ऐसे सीना ताने खड़ी हो गई, मानों किसी.ने सोच-समझकर उसे वहाँ स्थापित किया हो।

11 ज्योतिर्लिंग को प्रलय से बचने वाली भीम शिला / दिव्य शिला



आपदा के बाद जब दोबारा केदारधाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए, तब सरकार के साथ संत समाज ने भी इस दिव्य शिला की पूजा की। उसी दिन यह संकल्प भी लिया गया कि दिव्य शिला के दर्शन करने पर ही केदारनाथ की यात्रा संपूर्ण मानी जाएगी। सरकार ने भी दिव्य शिला के करिश्माई रूप को देखते हुए एएसआई (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) से इसे संरक्षित करने का आग्रह किया है। अब केदारनाथ धाम पहुंचने वाला हर श्रद्धालु सबसे पहले दिव्य शिला के करीब ही जा रहा है।

बाबा के भक्त विस्मय से इस शिला को निहारते हैं। उनकी आंखों में आस्था की एक ऐसी चमक होती है, जिसे शब्दों मे व्यक्त नहीं किया जा सकता। वह इन तर्कों को भी सिरे से खारिज करते हैं कि इस चट्टान का मंदिर के पीछे ठहरना महज संयोग था। ऐसे में दिव्य शिला की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन गई है।


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